रविवार, अप्रैल 01, 2012

नहीं रोया पत्थर

[}{] नहीं रोया पत्थर [}{]


पत्थर जो पूजे
मन से आप ने
बोले तो नहीं
आ कर कभी
आपके सामने ।

तुम रोए
गिड़गिड़ाए
आंसू बहाए
एक दिन भी
नहीं रोया
कभी पत्थर
तुम्हारे साथ
फिर क्यों रोए तुम
उस पत्थर के आगे ?

उस के नाम पर
तुम ने श्रृद्धा से
किए व्रत दर व्रत
बांची व्रत कथाएं
साल भर कीं
सभी एकादशियां
भूखे -निगोट-निर्जला
आया तो नहीं
कभी जलज़ला
उस पाहन में ?

सारे भोग प्रशाद
तुम ने तो नहीं
उसी ने लगाए
न उस के दांत चले
न कभी आंत
पता नहीं
कुछ पचा या नहीं
तुम्हारे भी मगर
कुछ बचा तो नहीं
उसकी स्थिर मुखराशि
स्थिर अधखुले अधर
ज्यों घड़े शिल्पी ने
पड़े रहे अधर !

किसी भी दिन
कुछ न बोला पाहन
दो शब्द भी नहीं
तथास्तु भर
स्थिर रहा
स्थिर रही आस्था
स्थिर तुम्हारी श्रृद्धा
मगर तुम्हारे भीतर
कुछ भी न था स्थिर !







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