मंगलवार, सितंबर 25, 2012

गज़ब ग़ज़ल


बहुत सुन्दर है तस्वीर आप की ।
मिलती नहीं मगर शक्ल बाप की ।।
पहन कर भी दिखते हो नंगे ।
डाला करो पतलून नाप की ।।
खा कर आए हो जूत बीवी से ।
बातें करते हो संताप की ।।
अब समझ आया टूटी कैसे ।

लेडीज चप्पल बाटा छाप की ।।
मूंछें रख कर मत समझो यार ।
संतान हो राणा प्रताप की ।।

( दसवीं में पढ़ते वक्त 1974 में लिखी थी । आज सफाई के दौरान मिली )
 आज कोई प्यारा सा सपना देख ।
आज कोई अपनों में अपना देख ।।
कयासों में गुजर जाती है ज़िन्दगी ।।
हकीक़त को पड़ता है तपना देख ।।

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 .
आकाश में कौई रोया है जार-जार ।
तभी तो आंसू बरस रहे हैं बार-बार ।।

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